Saturday, February 5, 2011

कविता लीटू कल्पनाकांत : परख

जीवण जात्रा 
रै
छैले पड़ाव 
बीं रै 
हुनर रै 
हुसन चढ्यो !


कांटा
तणा
मारग बधतां 
घणा
ल्हकोया घाव 
आस 
रै 
दिवला 
तणा
ताप 
तपायो
तन अर मन 
गळग्या
जद
हाड
लोग चढाया सिरधा  रा 
फूल 

संसार तणा 
सागर 
माय
कदै नी 
आया निजर 
जद 
बौम री टूंकल़ी
सूं
झाँक्यो
जणो जणो
उणी रै
रंग 
रंगीज्योड़ो हो