Monday, January 10, 2011

लीटू कल्पनाकांत री एक राजस्थानी कविता

                                 दीठ अदीठ
जीव जलम करमा री गत है , कुण हारे अर किण री जीत 
सम्मोहन हिवडै नै पोखै , हियै हेत सूं मिलज्या मीत 

अगन धरा पाणी अर आभो , सांसा वायु घाली कुण 
घाण घोळ कर पांचू तत रो , इण घट रो घट काडै कुण 
आँख कान नकलों अर रसना , हाथ पगां रा सस्तर सात 
पांचू इनरया गत नै साधै , अगत न आवै इण रै हाथ 
अगम अगोचर किण रै ओले , परतख सोच विचारे चींत 

धरती तरसै बादळ बरसै, तापै सुरजी निपजै धान 
चाँदड़लो इमरत  बरसावे, कीं परतख कीं होवै भान 
सिस्टी री गत नै कुण जाण, ऋचा मंत्र उच्चारै साम 
भांत-भांत रा मेला मंडऱ्या, कामण नै रीझावै काम 
जीव जीव रै कठ सगारथ , जतना जूझे जावै जीत 

जीव जलम रा रिश्ता मानै, जीवण रिश्ता रो आधार 
जीवंत जीव मरण कद मानै , जलम मरण पण है साधार 
क्यां सारु रोवै कल्पावै, क्यां सारु है मीत'र गीत 
क्यां सारु ओं  घडयों खोळीयो, क्यां सारु है दीठ अदीठ 
मो माया री रीत सनातन , ज्ञानी ढुं'ढ बण कर ढीट

जीव जलम करमा री गत है , कुण हारे अर किण री जीत 
सम्मोहन हिवडै नै पोखै , हियै हेत सूं मिलज्या मीत

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