Sunday, October 31, 2010

काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत ऱी अंतिम दीनां में लिखियोडी एक राजस्थानी रचना

        पलक झपकता गया कठीने ?





औस तणा नैनाकिया मोती , पसरयोडा हा इतरी ताळ!
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ?

आभै तणी कूख सूं उपन्यो , सुरज-गीगलो करतो  छैन!
जाय  चढ्यो  पूरब  री  गोदी ,   नेमधेम  री   सैनूंसैन!
बाड़ी-तणा फूल-पानका  , चिल्कै-मुळकै बण'र बहार !
मै उगते सुरजी नै देख'र लुळ-लुळ नमन करूँ मनवार !
सुरजी रै तप सूं  भापीज्यो , रीतो पड्यो दूब रो थाळ!
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ!

सुरजी परतख एक सांच है , कद जाणीजै उण नै झूठ !
औस तणा मोती'ई साँचा ,  बात नहीं  है  आ  परपूठ!
औस आस तो है छिणगारी , पल मे परगट पल मे लोप !
हियो सिलावै जगत सजीलो , सोक्याँ मायं  सांच री ओप !
पण सगला पल एक सरीसा , ना रैवै थिर कोई काळ!
औस तणा नैनाकिया मोती , पसरयोडा हा इतरी ताळ !
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ ?

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