Saturday, October 30, 2010

काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत की एक हिंदी कविता

        मैं तो भजन भाव हूँ
  ( काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत रचित हिंदी कविता )

मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !
मुझ में ध्वनित शब्द नाद को साधो ,तुम अपनाओ !

में न कभी परिभाषित होता , 'मैं' को 'मैं' ही जानो !
भजनभाव में विह्वल हो कर ,'मैं' को तुम अनुमानों !
सुनाने वाला मिले  न कोई , ' मैं'  को  बैठ  सुनाओ !
मैं तो  भजन भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !


भव  उत्पीडित सकल  जगत  है  घोर  भयावह  भाथी!
निविड़ - निभृत जीवन में, प्रिय तुम, ढून्ढ रहे हो साथी!
चरैवेति का चाक्छुस चंदन , घिस -घिस माथ लगाओ !
मैं  तो  भजन  भाव हूँ ,    मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

व्योम-विहग बन उड़ा प्राण जो , कहाँ पहुँच कर थमता?
छोर-हीन   विस्तार  व्याप्त  है ,  वह  जोगी  है  रमता !
अपरा के सम्मोहन में  तुम  मत  उस  को  उलझाओ!
मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

तीन काल की त्रिभुवन यात्रा , मैं तो अथक बटोही!
ढून्ढ  रहा  अपने  ही  भीतर , 'मैं'  को  मैं  हूँ   टोही!
'स्व' को भजन बनाया मैंने , 'स्व' को मत अलगाओ!
मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

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