Sunday, October 31, 2010

लीटू कल्पनाकांत: केंन्द्रीय साहित्य अकादमी सूं पुरस्कृत काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत री कूख पड्या री पीड़ पोथी री कैइएक रचनावा म्हारा बड़का भाई नीरज दइया रै आदेश मुजब

                                                   कूख  पड़यै री पीड़ 
       ( किशोर कल्पनाकान्त री रास्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कृति 'कूख  पड़यै री पीड़' री सिरै कविता ) 

 ओजूं एक चाणक्य
                  कूख मांय आग्यो है !
जापायत बणली अबकै
                     म्हारली भावना
जुगां सूं बाँझड़ी- कूख
बणसी अबै एक फल़ापतों- रुंख 
आंगण बाजसी सोवनथाळ 
फेरूँ कोई नी कैय सकै
                          कुसमो- काळ !
मानखै रो स्वाभिमान गासी मंगळगीत
होवै लागी अबै परतीत !

ओजूं  एक चन्द्रगुप्त जामैला !
स्वाभिमान नै टीयो दीखावणयाँ रो
                                   माथो भांगैला !
ऊथल़ो माँगेला 
                  चाणक्य रा नीत-मंत्र !
चन्द्रगुप्त रो भुजबळ मांगेला
                                 आपरो तंत्र
विजै-गीत गवैला चारण- भाट
उतर रैयो है 
  धरती उपरां एक आतमबळ विराट !
   इतिहास दुसरावैला आपरी रीत 
               होवै लागी अबै परतीत

अणतकाळ सूं रुपयोड़ी है
                      एक  जंगी - राड़
पटकपछाड़ 
देव-दाना रै बीच कद रैयो सम्प
दिसावां माँय भरीजग्यो है कम्प !
जद-कद  आडा आवै दधिची रा हाड़
स्याणा कैवे क जड़ लेवो किंवाड़ 
राड़ आगै बाड़ चोखी 
पण के ठा' ! कुण, किण रो है दोखी !
बरतीजै, जद बिरत्यां
गमज्यावै सिमरत्यां 
सुभावां री होवै ओळखाण 
बिरळबाण होय जावै
                धरम -करम  अणजाण
जद होवण लागै इसी परतीत 
अर भीसळ जावै मानखै री नीत
जद न्याय  नै
             गोडालाठी लगायनै 
             नाख देवै पसवाडै
नागी नाचण लागै अनीत चौडै.धाडै.
जणा भावना'र विवेक रै संजोग 
मानखै रै गरभ पडै.
              बो एक जोग !
काईं होवै लागी इसी परतीत ?
बोल -बोल !
         मनगीत !
ओ अनुभव है जुगां री एक सांच 
ऐकर गीता नै बांच !
रामायण नै गा !
उण कथ सूं हेत लगा !
जिको है बिरम रै उणियार !
बो-ई धरै चाणक्य-चन्द्रगुप्त  रो आकार !
नांवसोक मन माँय चींत !
द्खाँ, किसीक होवैं परतीत !

इयाँ कितराक दिन चालसी 
                        पाखण्ड - तणो वंस ?
छेवट, इण बजराक सूं  मरयां सरसी कंस !
घणा दिन नी रैया है बाकी 
चाल रैयी है काळ तणी चाकी 
नौवो-म्हीनो लागग्यो है आज 
                          नेडै. है जै अर जीत !
  होवै लागी परतीत !
मै,
पीड़ रै साथै  उछाव नै अनुभवूं !
मैं,
काळधणी नै माथो निंवू !
म्हारी पीड़
एक खुशी री पीड़ है
काळधणी री पगचाप
बगावत रो घमीड. है !
साव दीसै ममता
जामण री खिमता
भविष्य रो एक सुपनो प्यारो
म्हारी आँख रो तारो
 लाखूंलाख सुरजां सूं बेसी है !
                         सांसां माँय  बापरै !
बो नी है अबै आन्तरै !
बो-ई है म्हारो महागीत 
बो-ई है सागण परतीत !
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काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत ऱी अंतिम दीनां में लिखियोडी एक राजस्थानी रचना

        पलक झपकता गया कठीने ?





औस तणा नैनाकिया मोती , पसरयोडा हा इतरी ताळ!
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ?

आभै तणी कूख सूं उपन्यो , सुरज-गीगलो करतो  छैन!
जाय  चढ्यो  पूरब  री  गोदी ,   नेमधेम  री   सैनूंसैन!
बाड़ी-तणा फूल-पानका  , चिल्कै-मुळकै बण'र बहार !
मै उगते सुरजी नै देख'र लुळ-लुळ नमन करूँ मनवार !
सुरजी रै तप सूं  भापीज्यो , रीतो पड्यो दूब रो थाळ!
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ!

सुरजी परतख एक सांच है , कद जाणीजै उण नै झूठ !
औस तणा मोती'ई साँचा ,  बात नहीं  है  आ  परपूठ!
औस आस तो है छिणगारी , पल मे परगट पल मे लोप !
हियो सिलावै जगत सजीलो , सोक्याँ मायं  सांच री ओप !
पण सगला पल एक सरीसा , ना रैवै थिर कोई काळ!
औस तणा नैनाकिया मोती , पसरयोडा हा इतरी ताळ !
पलक झपकाता गया कठीने , करूँ औस री ढूंढा-भाळ ?

Saturday, October 30, 2010

लीटू कल्पनाकांत: काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत की एक हिंदी कविता

लीटू कल्पनाकांत: काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत की एक हिंदी कविता

काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत की एक हिंदी कविता

        मैं तो भजन भाव हूँ
  ( काव्ययोगी किशोर कल्पनाकांत रचित हिंदी कविता )

मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !
मुझ में ध्वनित शब्द नाद को साधो ,तुम अपनाओ !

में न कभी परिभाषित होता , 'मैं' को 'मैं' ही जानो !
भजनभाव में विह्वल हो कर ,'मैं' को तुम अनुमानों !
सुनाने वाला मिले  न कोई , ' मैं'  को  बैठ  सुनाओ !
मैं तो  भजन भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !


भव  उत्पीडित सकल  जगत  है  घोर  भयावह  भाथी!
निविड़ - निभृत जीवन में, प्रिय तुम, ढून्ढ रहे हो साथी!
चरैवेति का चाक्छुस चंदन , घिस -घिस माथ लगाओ !
मैं  तो  भजन  भाव हूँ ,    मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

व्योम-विहग बन उड़ा प्राण जो , कहाँ पहुँच कर थमता?
छोर-हीन   विस्तार  व्याप्त  है ,  वह  जोगी  है  रमता !
अपरा के सम्मोहन में  तुम  मत  उस  को  उलझाओ!
मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

तीन काल की त्रिभुवन यात्रा , मैं तो अथक बटोही!
ढून्ढ  रहा  अपने  ही  भीतर , 'मैं'  को  मैं  हूँ   टोही!
'स्व' को भजन बनाया मैंने , 'स्व' को मत अलगाओ!
मैं  तो  भजन  भाव हूँ  ,  मन  के  तंबूरे  पर  गाओ !

Friday, October 29, 2010

                   मायड़ भासा सारु
पूत कपूत बाया डोले अ  मायड़ रो घर बासे कूँ

आंधा ऱी इण नगरी मै बगया राजा चोपट जी 
बाँदर बाँट करै मतवाला माल उडावे पोपट जी 
राणी भरै पैंडे रो पाणी रांड करै है गपका जी 
हंसी  मसखरी करै विदुषा मारग दिवला चासे कुण